परमात्मा एक निराकार तत्व है |इसी में एक ऐसे देवता की कल्पना की गयी जो गले में सर्प की माला पहनता है |जिसके सिर पर चन्द्रमा शोभित है तो गंगा भी है |जो भोला भंडारी है |हाथ में त्रिशूल रखता है|इतना कल्याणकारी और परोपकारी है कि अमृत औरों के लिए छोड़ देता है और ज़हर को खुद पी लेता है और इतना सक्षम है कि उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने देता |
इतना शक्तिशाली और महत्वपूर्ण होने के कारण उसे महादेव कहते हैं |नृत्य करने के कारण तथा हाथ में डमरू रखने के कारण जिसे नटराज भी कहते हैं |कल्याणकारी होने के कारण उसे शिव कहते हैं |उसे महाक्रोधी भी माना गया है जो कुपित होने पर तांडव कर देता है जिसे रोकना किसी के लिए संभव नहीं है |
जिसने भी पहली बार की ,यह कल्पना बहुत सुन्दर की |शिव में एक -दूसरे के विपरीत गुण हैं |सिर में शीतलता है त्रिशूल रूप में विनाश भी है |वे आदर्श प्रेमी और पति हैं ,अपनी पत्नी के शव को भी आसानी से नहीं त्यागते और उनके सम्मान की सुरक्षा के लिए किसी को भी दण्डित कर सकते हैं |डमरू बजाते हैं ,नृत्य करते हैं इसलिए नटराज भी कहलाते हैं लेकिन गुरुगीता को प्रकट करते हैं तो परमज्ञानी भी हैं |इसके बावजूद भोले भाले हैं क्यूंकि राक्षसों की नकारात्मक प्रवृत्ति जानने के बावजूद उन्हें उनकी मर्जी के वरदान प्रदान कर देते हैं इस प्रकार खतरे ले लेते हैं और उनका रस लेते हैं शायद इसीलिए उन्हें अर्धनारीश्वर भी माना गया है |
शिवजी जनमानस के बहुत करीब हैं और गुणी-अवगुणी दोनों को अपने मतलब के लगते हैं इसलिए बहुत लोकप्रिय हैं |उनके भक्तों की संख्या लाखों में है |
इन सब चीजों की कल्पना का आनंद उठा लेने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं यह तो निराकार ही है |इसे चाहे जिस रूप में देखें यह उसी रूप में नज़र आता है |
बचपन में महादेवी वर्मा जी ने उनके लिए लिखा-
माँ के ठाकुर जी भोले हैं -
रोली -चन्दन उन्हें लगतीं
ठन्डे पानी से नहलातीं
उनका भोग हमें दे जातीं
फिर भी कभी नहीं बोले हैं -- माँ के ठाकुर जी भोले हैं -
शिव पत्नी पार्वती को गुरु गीता का उपदेश देते हुए स्कन्धपुराण में कहते हैं-
गुरुर्ब्रह्मा ,गुरुर्विष्णु ,गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः |
इस मन्त्र के अर्थ गुरु को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं |यह तत्व की बात कहने वाले भी शिव ही हैं |
हिंदुत्व कहता है कि इस सृष्टि के निर्माण ,संचालन और ध्वंस की जिम्मेदारी त्रिदेव की है, इनमें शिवजी भी हैं |त्रिदेव भी एक बहुत सुन्दर कल्पना है |सोचकर ही बहुत ख़ुशी होती है |त्रिदेव- तीनो एकसमान हैं |तीनो एकसमान होने के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करते है ,आपस में प्रतिदवंद्विता नहीं है |रामचरित मानस में एक बहुत सुन्दर प्रसंग है जिसमें वनवास के दौरान शिवजी राम जी को प्रणाम करते हैं तथा अपनी पत्नी का बताते हैं कि वे स्वयं प्रभु ही हैं |दूसरी और राम जी लंका में प्रवेश के पूर्व शिवजी की उपासना ,प्रतीक रूप में करते हैं |इसमें यह शिक्षा छिपी हुई है कि वैर-भाव अथवा प्रतिद्वंद्विता की बजाय एक-दूसरे का सम्मान करना बेहतर है |
हिन्दू धर्म ही नहीं बल्कि बाकी प्रचलित धर्म भी इश्वर को एक निराकार ही मानते हैं |एकोहम बहुस्याम अर्थात एक से बहुत हो जाने की कल्पना भी बहुत रोचक है |इस कल्पना से ही अठारह पुराणों की रचना हुई |सार तो वेदों और गीता में है और विस्तार पुराणों में है |सर्वोच्च शक्ति एक ही है निराकार है |
सतगुरु का बहुत ही धन्यवाद है जिन्होंने इस सर्वोच्च शक्ति का ज्ञान प्रदान किया जिससे हर धर्म अपना लगता है और हर पैगम्बर अथवा अवतार भी |मालिक कृपा करे कि हम इन दैवी व्यक्तित्वों से कल्याणकारी प्रेरणा ग्रहण कर सकें |