अरविन्द केजरीवाल होने का अर्थ


मेरे ख्याल से 2012  के आस-पास की बात है ,मेरे एक साथी सब्सिडी हटाने पर बहुत आक्रामक होते थे |उनका कहना था कि रसोई गैस का सिलेंडर जितनी कीमत का पड़ता है ,वो पूरी कीमत जनता को चुकानी चाहिए |जनता को सरकार से किसी रियायत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए | 


मैं कहता था कि सरकार किसी कम्पनी की तरह नहीं चलायी जाती कि कंपनी लाभ में चलनी चाहिए |प्रजातंत्र में लोककल्याण की अवधारणा महत्वपूर्ण है |


वर्तमान राजनीतिक क्षितिज पर केजरीवाल का अर्थ है- लोक कल्याण की अवधारणा |


बेशक इस समय वे मंझे हुए राजनेता की भूमिका में हैं लेकिन एक राजनेता होने से पहले वे एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं,जिन्हें 2006 में अंतर्राष्ट्रीय रेमैन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया |विगत 16 फरवरी को वे दिल्ली के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन वे पेशेवर राजनेता नहीं हैं |


मूलतः वे एक समाजसेवक हैं |उन्होंने जनता को सूचना का अधिकार दिलाने के लिए मजबूती से संघर्ष किया और भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए अन्ना आंदोलन के हिस्से बने |


जन लोकपाल विधेयक के निर्माण के लिए जारी यह आंदोलन अपने अखिल भारतीय स्वरूप में 5 अप्रैल 2011 को समाजसेवी अन्ना हजारे एवं उनके साथियों के जंतर-मंतर पर शुरु किए गए अनशन के साथ आरंभ हुआ, जिनमें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल, भारत की पहली महिला पुलिस  अधिकारी किरण बेदी, प्रसिद्ध लोकधर्मी वकील प्रशांत भूषण, पतंजलि योगपीठ के संस्थापक बाबा रामदेव आदि शामिल थे। संचार साधनों के प्रभाव के कारण इस अनशन का प्रभाव समूचे भारत में फैल गया और इसके समर्थन में लोग सड़कों पर भी उतरने लगे। इन्होंने भारत सरकार से एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक बनाने की माँग की  और अपनी माँग के अनुरूप सरकार को लोकपाल बिल का एक मसौदा भी दिया था। किंतु श्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने इसके प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया और इसकी उपेक्षा की। इसके परिणामस्वरूप शुरु हुए अनशन के प्रति भी उनका रवैया उपेक्षा पूर्ण ही रहा। किंतु इस अनशन के आंदोलन का रूप लेने पर भारत सरकार ने आनन-फानन में एक समिति बनाकर संभावित खतरे को टाला और 16 अगस्त तक संसद में लोकपाल विधेयक पास कराने की बात स्वीकार कर ली। अगस्त में  शुरु हुए मानसून सत्र में सरकार ने जो विधेयक प्रस्तुत किया वह कमजोर और जन लोकपाल के अन्ना के विचार के  सर्वथा विपरीत था। अन्ना हजारे ने इसके खिलाफ अपनी पूर्व घोषित तिथि 16 अगस्त से पुनः अनशन पर जाने की बात दुहराई। सरकार ने इसकी राह में कई रोड़े अटकाए एवं 16 अगस्त को अन्ना हजारे एवं उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया।



यहाँ से अरविन्द केजरीवाल एक मजबूत और प्रभावशाली कार्यकर्ता के रूप में उभरे |


अन्ना हज़ारे अपने आंदोलन के लिए सत्याग्रह और आमरण अनशन आदि को ही माध्यम बनाने के पक्षधर थे लेकिन अरविन्द केजरीवाल इस सम्बन्ध में ज्यादा व्यावहारिक नज़र आये |अन्ना का मार्ग जहाँ केवल तपस्या का मार्ग था वहीं अरविन्द केजरीवाल का कहना था कि सत्ता का अंग बनकर जनता के कार्यों को बेहतर ढंग से किया जा सकता है |


अन्ना आंदोलन में उन्हें भारत की पहली महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी,प्रो.योगेंद्र यादव,अधिवक्ता प्रशांत भूषण, प्रो.आनंद कुमार आदि का साथ मिला |26नवंबर 2012  को इन्होने मिलकर आम आदमी पार्टी नामक एक राजनीतिक दल का गठन किया |


वर्ष 2013  में दिल्ली में चुनाव हुए |विधान सभा के इन चुनावों में कांग्रेस की सरकार चली गयी | भाजपा सबसे बड़ा दल बनकर उभरी लेकिन सत्ता से दूर थी |इन परिस्थितियों में अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनायी जो कि 49 दिनों तक चली |


यह एक अजीब ही दौर था |अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री भी थे और आंदोलनकारी भी थे |केंद्र सरकार के साथ उनका खुला संघर्ष था |किरण बेदी ने केजरीवाल के आंदोलन का विरोध किया | दिल्ली के एक नागरिक के तौर पर स्वयं मुझे भी लगता था कि एक मुख्यमंत्री को आंदोलनकारी नहीं होना चाहिए चूंकि उनके पास सत्ता है इसलिए मुख्यमंत्री जो करना चाहते हैं उन्हें सत्ता के माध्यम से करना चाहिए |किरण बेदी ने उन्हें अराजकतावादी कहा और केजरीवाल ने अराजक होना खुले आम स्वीकार किया |


इसी दवंद्व को दिल्ली की जनता महसूस कर रही थी |साथ ही जनता यह भी महसूस कर रही थी कि यह ऊर्जावान इंसान अपनी बात खुलकर कहता है |इसका जीवन खुली किताब है और यह जनता के लिए कुछ करना चाहता है |


2015 में चुनाव हुए तो जनता ने अरविन्द केजरीवाल को ज़बरदस्त बहुमत दिया |कांग्रेस बिलकुल साफ़ हो गयी और भाजपा को सत्तर में कुल तीन विधायक मिले |इस प्रकार जनता जो दे सकती थी दे दिया लेकिन केजरीवाल अब भी आंदोलनकारी ही बने हुए थे |केंद्र सरकार जो कि अब भाजपा की थी और उपराज्यपाल के साथ उनका खुला टकराव था |


भाजपा सरकार और उपराज्यपाल उनके मार्ग के बड़े रोड़े थे |2018 में उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने उन्हें रहत दी और उन्होंने जनता के लिए प्रभावी काम किये |उनके लोककल्याणकारी काम थे -बिजली की कीमत बढ़ने न देना ,200  लीटर तक पानी मुफ्त  देना  ,मोहल्ला क्लिनिक ,सिग्नेचर ब्रिज का लोकार्पण और दिल्ली परिवहन निगम की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा सुविधा |


2014के चुनावों में अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा माँगा लेकिन अपने घोषणा पत्र में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की घोषणा करने के बावजूद केंद्र सरकार ने केजरीवाल की इस मांग पर रत्ती भर भी ध्यान न दिया |
अंततः केजरीवाल ने 2020 के चुनावों में फिर इतिहास दोहराया और जनता ने सिद्ध कर दिया कि जाति-धर्म ,येन केन प्रकारेण सत्ताप्राप्ति के नग्न प्रयासों को वह आँख मूंदकर नहीं देख सकती | अंततः 2014का इतिहास फिर दोहराया गया |भाजपा ने थोड़ी प्रगति की लेकिन कांग्रेस निर्जीव ही दिखाई दी |


16 फरवरी  2020 के रामलीला मैदान के ऐतिहासिक भाषण में केजरीवाल ने जनकल्याण के अपने कार्यक्रमों को जारी रखने का संकल्प स्पष्ट कह दिया है |अब उनमें वर्ष 2013 -14  की अपरिपक्वता नज़र नहीं आती और देश की सरकारों को लोककल्याण के कार्य करने की चुनौती देता हुआ मजबूत राजनेता हमें दिखाई देता है |लोग उनमें प्रधानमंत्री का पद संभाल सकने की क्षमता देखना चाहते हैं |



यह महत्वाकांक्षा तो उनमें प्रारम्भ से ही है ,तभी तो 2014 में वाराणसी जाकर उन्होंने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को चुनौती दी थी |


केजरीवाल की कमजोरी है कि वे विभिन्न लोगों को साथ लेकर नहीं चल सकते |प्रो.योगेंद्र यादव,आनंद कुमार तथा प्रशांत भूषण को वे साथ लेकर नहीं चल पाए |कपिल मिश्रा और अलका लाम्बा को संभाल नहीं सके |


उनकी अनेक ऐसी नीतियां हैं जिन्होंने उनकी राष्ट्रीय सोच को सवालों के घेरे में रखा है,वे दूसरे दलों की प्रतिक्रिया स्वरुप भी हो सकती हैं इसलिए उन नीतियों को संदेह का लाभ देना चाहिए ,चूंकि राष्ट्रीय जिम्मेदारी स्वयं ही व्यक्ति को बदल देती है |एक महत्वपूर्ण बात जो उन्हें महात्मा गाँधी के निकट लाकर खड़ा कर देती है ,वह है उनके सामाजिक सरोकार |इसी के कारण वे ऐसी आर्थिक नीतियां लागु कर सके हैं,जिसने जनसेवा तो की लेकिन महंगाई नहीं बढ़ने दी |  हिंदी के लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास उनके पुराने साथी हैं लेकिन उन्हें भी वे साथ नहीं रख पाए |


आम आदमी पार्टी को वे पेशेवर राजनीतिज्ञों  का मंच बनने से बचा सकेंगे इसमें अपार संदेह हैं |