आज तीस जनवरी है, 1948 में आज ही के दिन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को गोली मारी गयी थी | किसने गोली मारी या क्यों मारी गयी, ये प्रश्न आज बेमानी लगते हैं क्यूंकि महात्मा गाँधी सत्य और अहिंसा के प्रतीक हैं और आज के दौर में अहिंसा के बाजार में भारी मंदी है |
अहिंसा मेरे ख्याल से एक बड़ा कारण है,जिसके कारण इस दुनिया में इंसान जीवित है | यदि युद्धों के कारण इंसान जीवित रहा होता, दूसरा विश्व युद्ध कभी खत्म न होता बल्कि और युद्ध होते रहते लेकिन हम मनुष्य हैं, समाज में रहते हैं और शांति चाहते हैं |शांतिपूर्ण सहअस्तित्व ही वो तत्व है,जो जीवन के अस्तित्व का मूल कारण है | जहाँ तक मुझे याद है ,यह सर मोहम्मद इक़बाल का शेअर है, जो पहली बार मैंने डॉ.राजेंद्र प्रसाद जी के लेख - भारतीय संस्कृति में पढ़ा था -
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे-ज़मां हमारा,
इसी ग़ज़ल के एक अन्य शेअर में सर मोहम्मद इक़बाल लिखते हैं -
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं हम वतन है, हिन्दोस्ताँ हमारा |
दिल्ली में आजकल चुनावों का दौर है, और चुनाव आजकल मर्यादित नहीं रहे हैं, चूंकि राजनीति समाज सेवा की बजाय जनसेवा का कारोबार सरीखी हो गयी है |दिल्ली के वातावरण को देखकर ऐसा लगता है कि आजकल इक़बाल साहब का यह विचार -
मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना, प्रासंगिक नहीं रहा है |
दिल्ली में आजकल नारा गूँज रहा है -देश के गद्दारों को, गोली मारो.....को |
यह सुनना ही कितना दर्दनाक है कि चुनाव में जीत के लिए जनता के एक हिस्से को गद्दार घोषित कर दिया गया है,जबकि एक नागरिक को दूसरे नागरिक को वफादार या गद्दार कहने का कोई अधिकार नहीं है |
भारत में एक संविधान है जिसके लागू होने का उत्सव हमने चार दिन पहले मनाया है |नागरिकों की वास्तविकता की पहचान करने के लिए विभिन्न संस्थाएं हैं |भारतीय राष्ट्र ने प्रजातान्त्रिक शासन पद्धति अंगीकार की है और नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने तथा अपनी बात कहने की मौलिक स्वतंत्रता प्रदान है |इसके बावजूद भारत सरकार के जिम्मेदार मंत्री जनता से नारे लगवा रहे हैं - देश के गद्दारों को, गोली मारो.....को |
क्या यह हिंसा के लिए उकसाना नहीं है ? भीड़ को उकसाने वाले क्या कानून को अपने हाथ में लेकर प्रशासन को पंगु नहीं बना रहे हैं ? क्या ऐसे लोगों को जिम्मेदारी के पद पर विराजमान रहने का नैतिक अधिकार है ?
यह महात्मा गाँधी के जन्म का 150वां वर्ष है |पूरे देश में यह श्रद्धापूर्वक मनाया जा रहा है |भारत सरकार इस उपलक्ष्य में कई आयोजन कर रही है, साथ यह भी एक कटु सच्चाई है कि लोकसभा में ऐसे सम्मानित सदस्य हैं जो महात्मा गाँधी पर खुलकर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं|
इसे क्यों न विरोधाभास माना जाए कि महात्मा गाँधी के हत्यारे के समर्थक ये सदस्य उन लोगों को देशप्रेमी मानने में गौरव का अनुभव करते है |
रोचक तथ्य यह भी है कि ये लोग महिलाओं के उत्पीड़न,आर्थिक मन्दी, लोगों की बेकारी, युवाओं की बेरोजगारी और निर्भया के कुकर्मी हत्यारों को न्यायालय द्वारा फांसी का निर्णय कर दिए जाने के बावजूद, उस पाप को हुए सात वर्ष का लम्बा समय बीतने के बावजूद, फांसी न हो पाने पर कुछ नहीं बोलते |
कुछ वर्ष पहले तक आज के दिन शहीद दिवस मनाया जाता था लेकिन आज ऐसी कोई चर्चा सुनने को नहीं मिली |
यह तो निश्चित ही है कि भारत में अब महात्मा गाँधी पहले जितने महान नहीं रहे हैं चूंकि सत्ता उनके हत्यारे को स्वीकार्य मानती है | इसका अर्थ है कि भारत बदल रहा है |
यह स्पष्ट मान्यता है कि समझदार लोग समय के साथ अपने आपको बदल लेते हैं | समय का तकाज़ा है कि हम भी अहिंसा के स्थान पर गोली मारने वाले नारों का समर्थन करें अन्यथा कोई भी सिरफिरा किसी भी सामान्य व्यक्ति को देशद्रोही का तमगा देने में देर नहीं लगाएगा |
महात्मा गाँधी प्रार्थना और सत्याग्रह में विश्वास रखते थे, मैं भी प्रार्थना करता हूँ कि परमात्मा हमें विवेकी बनाये रखे ताकि हम अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग पर दृढ़ रहें |
आज के सन्दर्भ में 30 जनवरी का अर्थ
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