गांधीवाद और गोडसेवाद


हमने तो बचपन से गांधीवाद ही सुना था लेकिन कुछ वर्षों से गोडसेवाद भी अस्तित्व में आ गया है |अभी यह इतना प्रचलित नहीं है लेकिन जल्दी ही प्रचलन में आ जाएगा,आशा है |इसे आशा कहूँ ,निराशा कहूँ या कुहासा कहूँ,समझ नहीं पा रहा हूँ लेकिन यह दौर ऐसा है कि गांधीवाद के दिन गर्दिश में लग रहे हैं |कुछ दशक पहले तक गांधीवाद के दिन इतने बुरे नहीं थे |गांधीवाद की जगह लोगों के दिलों में थी और सरकार के दिल में भी थी लेकिन सरकार का दिल तो किसी राजनीतिक दल के शरीर में होता है | उस राजनीतिक दल की विचारधारा गाँधी जी के अनुकूल है या गोडसे के अनुकूल है,इस पर निर्भर करता है कि गांधीवाद रहेगा या गोडसेवाद ?गाँधी जी की जब जन्म शताब्दी मनाई गयी तब गांधीवाद हमारे इस देश का निर्विवाद नायक था |1977 में भारत की सरकार बदली लेकिन गाँधी जी और गांधीवाद के सामने कोई चुनौती पेश नहीं हुई |


गाँधी जी के हिंदुत्व पर कभी इस देश ने प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया लेकिन उग्र हिंदुत्व की विचारधारा जब प्रबल हुई तो गाँधी जी पर प्रश्न चिन्ह लगने लगे |


मुझे उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री याद आ रहे हैं -एक ने गाँधी जी को राष्ट्रभक्त तो माना लेकिन राष्ट्रपिता नहीं |


यह पहला अवसर था जब हमारी पुरानी विचारधारा ने झटका खाया |दूसरी पूर्व मुख्यमंत्री ने गाँधी जी को शैतान का बच्चा कहा |यह शब्द अस्वीकार्य लगा बल्कि मेरे जैसे लोगों तो यह अपशब्द लगा | लेकिन इस समय तक गाँधी जी का विरोध तो था लेकिन गोडसे का समर्थन नहीं था |


अभी तो गाँधी जी और गोडसे को एक ही तुला पर तोल दिया गया है |


मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लोकसभा के सदस्य के तौर पर निर्वाचित साध्वी प्रज्ञा को कल द्रमुक सांसद ए.राजा द्वारा नाथूराम गोडसे पर की गयी टिप्पणी कुछ ज्यादा ही नागवार लगी और उन्होंने जैसे संयम खो दिया और उनकी टिप्पणी का तुरंत विरोध किया |


साध्वी प्रज्ञा द्वारा गाँधी जी का विरोध कोई नया नहीं है बल्कि यह विरोध ही तो उनकी ताक़त है |इसी बिना पर तो सत्ताधारी दल ने उन्हें टिकट दिया था |इस घटनाक्रम से स्पष्ट हो गया था कि सरकार का गांधीप्रेम वास्तविक नहीं है |


प्रधानमंत्री जी का गाँधी प्रेम भी वास्तविक नहीं है यह तब बिलकुल स्पष्ट हो गया था जब उन्होंने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मैं साध्वी प्रज्ञा सिंह को मन से माफ़ कभी नहीं कर पाऊंगा |प्रधानमंत्री जी का यह भाव यदि सत्य होता तो किसी सांसद में दोबारा गाँधी जी के ऊपर गोडसे को जगह देने की हिम्मत नहीं पड़ती |


खैर साध्वी के गाँधी जी का विरोध करने से मुझे कोई आपत्ति नहीं है क्यूंकि उन्होंने ईमानदारी से और खुलकर अपनी बात कही |


समर्थन अथवा विरोध भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकार हैं और सांसद होने के नाते विरोध दर्ज़ करवाना उनका अधिकार है लेकिन जिस मुद्दे पर उन्होंने विरोध किया है वह उन्हें हिंसा अथवा आतंक के करीब तो ले जाता है लेकिन साध्वी सिद्ध नहीं करता |साध्वी सिद्ध होने के लिए जो असाधारण संयम चाहिए ,उसे प्रदर्शित करने में वे असफल रहीं |


जितनी ईमानदारी से साध्वी ने गोडसेवाद का समर्थन किया है उतनी ही ईमानदारी और मजबूती से प्रधानमत्री जी को भी अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए कि वे गाँधी जी के समर्थक हैं या गोडसे के ?


साध्वी प्रज्ञा को गाँधी जी के विरोध का जितना अधिकार है प्रधानमंत्री जी को भी है लेकिन ऊपर से गाँधी प्रेम और भीतर से गोडसेप्रेम राजनीतिक बेईमानी है और चक्रवर्ती ,यशस्वी प्रधानमंत्री से बेईमानी की अपेक्षा नहीं है|यह एक कटु सत्य है कि गाँधीवाद और गोडसेवाद एक साथ नहीं रह सकते |