जहाँ देखिये बेकारी है।
सबपे छाई लाचारी है।
पढ़-लिखकर सब ठोकर खाएं
कहाँ नौकरी सरकारी है !
जिसको देखो भाग रहा है।
रात-रात भर जाग रहा है।
फिर भी हाथ न धेला आता
गा अपना ही राग रहा है।
काम नरेगा में मिल जाए
परधान का बड़ा आभारी है।
अमा मियाँ थोड़ा तो सोचो,
कहाँ नौकरी सरकारी है !
बिना सिफारिश नहीं नौकरी
बिना घूस के बात नहीं
नहीं जिन्होंने घूस दिया हो
ऐसी कोई जात नहीं।
छोटा-मोटा धंधा कर लो,
जो सर पे जिम्मेदारी है।
बड़का भईया जाने भी दो
कहाँ नौकरी सरकारी है !
डिग्री-विग्री गर्दा खाए।
भूले से न काम ये आये।
फार्म भरो पंच सौउवा जाए।
तंगी-भंगी और बनाए।
परिणाम परीक्षा बिन आ जाए।
ऐसा देश चमत्कारी है,
"जतन" करत औघाई आए
कहाँ नौकरी सरकारी है !
- अश्वनी कुमार "जतन"