प्राचीनकाल से भारतभूमि धर्म प्रधान है |रामकृष्ण परमहंस ईश्वर को माँ रूप में देखते थे जबकि ज्यादातर सन्त ईश्वर के परमपितास्वरुप को आराध्य मानते हैं |जनसामान्य तो परमात्मा के दोनों ही रूपों को उपास्य और आराध्य मानते हैं |
आजकल अश्विन माह चल रहा है | इस माह में नौ देवियों की उपासना की जाती है| नारी में देवी का स्वरुप देखना चरित्र का उच्चतम रूप है लेकिन व्यवहार में यह दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता | बहरहाल यह महीना मन को धार्मिक उत्साह व् मातृशक्ति की महत्ता से भर देता है |
वेद कहते हैं -
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता
अर्थात जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है | यह असंभव सी अवस्था दिखाई देती है लेकिन मैं सोचता हूँ कि पूजा तो असंभव है लेकिन नारियों का सम्मान तो किया ही जा सकता है |हमारे त्योहार हमें नारियों के प्रति सम्मानित दृष्टिकोण अपनाने की ही प्रेरणा देते हैं जबकि परिस्थितियां ऐसी हैं कि स्वस्थ मानसिकता रखे बिना न नर शांति से रह सकता है न नारी इसलिए स्वस्थ मानसिकता रखनी प्रथम कर्तव्य है |इस परिपेक्ष्य में यह बात तो तय है कि भारत धर्मप्रधान देश है |
स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि भारत में यदि किसी विचार को जन- जन के व्यवहार का अंग बनाना है तो उसे धर्म से जोड़ दें तो व्यवहार का अंग बन जाएगा |उनका मानना था कि वैज्ञानिक विकास हम पश्चिम से सीख सकते हैं और धर्म का वास्तविक रूप वे भारत से सीख सकते हैं |
लेकिन उनका धर्म कूप मण्डूकता का धर्म नहीं था |जिस युग में यहाँ लोग मानते थे कि समुद्र पार करने से धर्म नष्ट हो जाता है-कहावत थी कि समुद्र पार जाने से धर्म पानी में नमक की तरह गल जाता है उस युग में वे पश्चिमी देशों में प्रगतिशील धर्म अर्थात मानव मात्र की सेवा का प्रचार-प्रसार करने के लिए पहुंचे |
उनकी विशेष बात यह भी थी कि सेवा की उनकी प्रेरणा पढ़े - सुने सन्दर्भों पर आधारित नहीं थी बल्कि सेवा उनके व्यवहार की अंग थी |
उनके बारे में मैंने पढ़ा है कि कलकत्ते में एक बार प्लेग रोग फैला हुआ था ,बड़ी संख्या में लोग मर रहे थे |उन मरते हुए लोगों को देखकर तथाकथित धार्मिक लोग कह रहे थे कि ये लोग अपने पापों का दंड भुगत रहे हैं |
संसार में ऐसे लोगों की कमी कभी नहीं रही जो दूसरों को पापी बताकर उनका उपहास करते हैं ,और जैसे समझते हैं कि सबसे बड़े पुन्नी वही हैं |
ये लोग ऐसा कह रहे थे और स्वामी विवेकानंद और उनके शिष्य उनकी सेवा में लगे थे |तथाकथित धर्मशास्त्री उन्हें रोकते थे |उनका तर्क था कि ये लोग अपने पापों का दंड भुगत रहे हैं -परमेश्वर की यही इच्छा है |
इन्हें औषधि देना परमेश्वर की इच्छा में बाधा पहुंचाना है |इस प्रकार आप स्वयं पाप के भागीदार बन रहे हैं ,उन्होंने स्वामी जी को डराया |
स्वामी जी ने कहा कि मर रहे लोगों को औषधि देना तो पुण्य का काम है |अगर पाप करने से पाप बढ़ते हैं तो पुण्य करने से पुण्य भी बढ़ते हैं |क्या पुण्य का काम करना गलत है ?क्या यह परमात्मा की प्रेरणा के विरुद्ध है ?
पुण्य कर्म को परमात्मा के विधान के विरुद्ध बताने का बुद्धि कौशल उन धर्मभीरुओं में नहीं था | इस प्रकार स्वामी विवेकानंद उन दुखियारों की सेवा में लगे रहे |
सुबह पार्क से सैर करके लौट रहा था कुछ बच्चे चहकते दिखाई दिए|बच्चे चूंकि 20 -25 के आस-पास रहे होंगें तो मुझे ख्याल आया कि कहीं कोई स्कूल का कोई जुलूस तो नहीं है चूंकि विषय बड़ों के होते हैं और तपस्या बच्चों की हो जाती है |पोलियो की दवा से लेकर ,पटाखे न चलाने की अपील तक बच्चों से करवाई जाती है|उन बेचारों को अक्सर पता ही नहीं होता कि उनकी अपील क्या है और किससे है?
लेकिन यह जुलूस नहीं था,ये तो गरीब बच्चे थे ,जो इस भाव को लेकर गली में घूम रहे थे कि दुर्गाष्टमी के उपलक्ष्य में कोई उन्हें जिमायेगा और दक्षिणा भी देगा ?
स्पष्ट कहूँ तो ये भूखे बच्चे थे जो भोजन की तलाश में थे |आज हलवा-पूड़ी की दावत हो सकती थी ,जो उनके लिए बड़ी बात थी |
वर्षों पहले से इस प्रकार के अनुष्ठान मैंने नहीं किये हैं, चूंकि मेरी भक्ति एक विराट निराकार परमसत्ता से जुडी है और निराकार सर्वव्यापक और सर्वसमर्थ है|इस प्रकार मेरी आराधना परमेश्वर के पिता स्वरुप से जुडी है लेकिन माँ के विरुद्ध कोई हो नहीं सकता |मेरे मन में भाव आया कि मैं ही कुछ खाद्यान्न बाजार से खरीदकर इन्हें बाँट दूँ चूंकि भाव सेवा का था |
मन में भाव यह भी आया कि स्वतंत्रता के सत्तर वर्ष बाद भी भूखे बच्चे अच्छे भोजन की तलाश में घूम रहे हैं ,इसका अर्थ है कि भूख की दृष्टि से अभी हम विकसित राष्ट्र नहीं हैं |
ये कुछ दूर बसी झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनी के बच्चे थे,जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं,जिनके पिता रिक्शा चलाते हैं या मजदूरी करते हैं |गरीबी के कारण भरपेट खाना भी रोज नसीब नहीं होता |
कुछ संपन्न लोग हैं जो इनके प्रति दयालु हैं और इन्हें सींचते हैं जबकि कुछ लोग इन्हें डपटकर भगा देते हैं |
एक स्वामी जी हैं जो इनकी बढ़िया सेवा करते हैं,दक्षिणा में एक बच्चे को पांच सौ रूपये तक भी दे देते हैं |रोज मजदूरी न पा सकने वाले पिताओं के बच्चों के लिए ये पांच सौ रूपये किसी वरदान से कम नहीं हैं |
विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या स्वामी विवेकानंद जी का दृष्टिकोण गलत था ,जो वे परमेश्वर की इच्छा में बाधा डाल रहे थे अथवा वे धर्माचार्य गलत थे जो सेवा जैसे पुनीत कार्य से उन्हें रोक रहे थे ?
यह एक दोराहा होता है जो हमारे जीवन में अक्सर ही आता है |इस समय सही या गलत मार्ग का चयन करने में हम समर्थ होते हैं |मेरा निजी अनुभव है कि हर मनुष्य के जीवन में ऐसा क्षण जरूर आता है और अक्सर आता है, जब हम दोराहे पर खड़े होते हैं लेकिन अज्ञात कोप से डरकर गलत मार्ग पकड़ लेते हैं, सेवा के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ते |
भारतभूमि धर्मप्रधान है |यहाँ के निवासियों में अधिकांश लोग आस्तिक हैं तथा परमेश्वर से डरने वाले हैं |इन धर्मभीरू लोगों से किसी क्रांति की उम्मीद कभी भी नहीं की गयी लेकिन इस भीड़ में से ही ऐसे महामानव भी निकले जिनका एक - एक शब्द क्रांति की मशाल था |
स्वामी विवेकानंद ऐसे ही महामानव थे जो किसी घेरे में बंधकर नहीं सोचते थे इसलिए उनकी कोई भी बात दिल-ओ-दिमाग में स्थायी स्थान बना लेती है जैसे वे कहा करते थे -
पहले कहते थे कि नास्तिक वह है जिसे परमात्मा पर विश्वास नहीं, मैं कहता हूँ कि नास्तिक वह है जिसे अपने आप पर विश्वास नहीं |
ऐसी प्रगतिशील विचारधारा को पुष्ट करने वाले स्वामी विवेकानंद धर्मो की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर अपनी पहचान रखते हैं |
बरगलाने और बहकाने वालों की कमी नहीं है लेकिन जो आत्मविश्वासी हैं वे कभी बहकते नहीं | ऊपर से देखने पर आत्मविश्वास और अहंकार एक जैसा दिखता है लेकिन आत्मविश्वास और अहंकार में इतना बड़ा फर्क है जितना कि पानी और तेल में |पानी आग बुझाता है तेल आग भड़काता है |
आत्म विश्वास सकारात्मक ऊर्जा है जो सेवा करने की शक्ति प्रदान करती है |अहंकार नकारात्मक ऊर्जा है जो किसी को सेवा करते देखकर ही ईर्ष्या में बदल जाती है और सेवा में बाधा उत्पन्न करती है |
हमें आत्मविश्वासी होना चाहिए,अहंकारी नहीं |परमात्मा को माँ के रूप में देखें या पिता के रूप में लेकिन भावना सच्ची होनी चाहिए |
परमात्मा - पिता है या माँ ?
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