भारत की भूमि संतो-महात्माओं परिणामस्वरूप भक्ति के उस आनंद प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम की भूमि है, जो कि अज्ञान व हिंसा को पाया जो अलौकिक है। ऐसे ही उनका पैतृक व्यवसाय था और के घोर अन्धकार में लोगों को ज्ञान एक महात्मा थे संत रैदास जी, उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वे और प्रेम की राह दिखाती आ रही जिन्होंने भक्ति का जहाँ स्वयं भी अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम है। यही ऐसा तत्व है जो हर युग में आनंद लिया वहीं शेष समाज को भी से करते थे और समय से काम को राहत का प्रबंध करता आ रहा हैविशाल दृष्टि से देखते हुए इस पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। संतो-महात्माओं ने किसी के साथ अमृत रस का आस्वादन कराया।
गुरू रविदास जी का जन्म काशी में चर्मकार (चमार) कुल में हुआ था। उनके पिता का नाम संतोख दास (रग्घु) और माता का नाम कलसा देवी और धुरबनिया भी बताया जाता है। संत रविदास कबीर के समसामयिक कहे जाते हैं। मध्ययुगीन संतों में रैदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतः इनका समय सन् 1398 से 1518 ई. के आस-पास का रहा होगा।
रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वे अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे।
उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे।
प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्रायः मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रविदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रविदास जी पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर रहने लगे। वे तय समय तक तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय में ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।
उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का पता चलता है। वे एक मर्यादित गृहस्थ संत थे जो कि ज्ञान और कर्म की समान महत्ता देते थे। यह महत्ता इस प्रसंग से भी प्रकट होती है - एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, 'गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा।' गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा ? मन जो काम करने के लिए अन्तःकरण से तैयार हो वही काम करना उचित हैसामने वाले ने कुछ व्यंग्यात्मक लहजे में बात कही तो उन्होंने कहा कि गंगा स्नान के लिए जाना अच्छी बात है लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है अपने मन को स्वच्छ रखना। मन सही है तो इसे कठौती के जल में भी गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि – मन चंगा तो कठौती में गंगा।
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर–भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिल-जुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया। वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं । वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।
'कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।'
"वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।"
उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित - भावना तथा सदव्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ सरल व्यवहार करने, विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। अपने एक भजन में उन्होंने कहा है -
'कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै ।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।'
उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान रहित रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि - विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की 'पिपीलिका' (चींटी), इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्यागकर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
रैदास जैसे संत भक्ति और मानवता के प्रतीक होते हैं लेकिन राजनीतिक लाभ लेने के ने ऐसे संतो को भी जातियों में बाँट दिया है। इसे एक विडम्बना न कहें तो क्या कहें।
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सब को परस्पर मिल – जुलकर प्रेमपूर्वक रहने काउपदेश दिया I
रैदास जी की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी इसलिए उसका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वतः उनके अनुयायी बन जाते थे।
उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये |
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।
कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं। आज जब कि जाति के नाम पर ऊँच-नीच समझना वैधानिक अपराध हो चुका है रैदास जी ने पहले ही इस समस्या की निरर्थक घोषित कर दी थी। उनकी ये पंक्तियाँ देखिए -
उवर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।
आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं |
इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्याधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। संत कवि रैदास उन महान सन्तों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही हैं जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है |
मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है। गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी रैदास उच्च-कोटि के विरक्त संत थे। उन्होंने ज्ञान-भक्ति का ऊंचा पद प्राप्त किया था। उन्होंने समता और सदाचार पर बहुत बल दियावे खंडन-मंडन में विश्वास नहीं करते थे। सत्य को शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना ही उनका ध्येय थारैदास का प्रभाव आज भी भारत में दूर-दूर तक फैला हुआ है। वर्तमान समय में इस मत के अनुयाई रैदासी या रविदासी कहलाते हैं।
हम रैदास की विचारधारा और सिद्धांतों को संत-मत की परम्परा के अनुरूप ही पाते हैं। उनका सत्यपूर्ण ज्ञान में विश्वास था। उन्होंने भक्ति के लिए परम वैराग्य अनिवार्य माना हैपरम तत्त्व सत्य है, जो अनिवर्चनीय है – 'यह परमतत्त्व एकरस है तथा जड़ और चेतन में समान रूप से समाहित है। वह अक्षर और अविनश्वर है और जीवात्मा के रूप में प्रत्येक जीव में उपस्थित है। संत र द । स की साधना पद्धति का क्रमिक विवेचन नहीं मिलता है। जहाँ-तहाँ प्रसंगवश संकेतों के रूप में वह प्राप्त होती है। विवेचकों ने रैदास की साधना में 'अष्टांग' योग आदि को खोज निकाला है। संत रैदास अपने समय के प्रसिद्ध महात्मा थे। कबीर ने संतनि में रविदास संत कहकर उनका महत्त्व स्वीकार किया। इसके अतिरिक्त नाभादास, प्रियादास, मीराबाई आदि ने भी रैदास का ससम्मान स्मरण किया है।
भक्ति के उच्च गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान मिला और ज्ञान और कर्म में समन्वय रखने के कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापर्वक स्मरण करते हैं।