कोई समय था जब व्यक्ति की पहचान उसके सिद्धांतों से होती थी|
जिस व्यक्ति के सिद्धांत नहीं अब भी प्रायः उसे बिना रीढ़ का माना जाता है |उसे विश्वास करने लायक
प्रायः नहीं माना जाता |
ऐसे व्यक्तियों के बारे में कहावत है-गंगा गए तो गंगादास ,यमुना गए तो यमुना दास अर्थात वे हर किसी से प्रभावित हो जाते हैं |उनका खुद का कोई विचार नहीं रहता और किसी भी भीड़ के हिस्से हो जाते हैं |
इस भीड़ की मानसिकता की प्रायः संकीर्ण स्वार्थ को समर्पित होती है अर्थात जिधर से लाभ होता दिखेगा वे उधर ही चिपक जाएंगे |मक्खी वहीं जाती है जहाँ गुड़ होता है |यही कारण है कि बचपन से ही व्यक्तियों की तुलना में मेरा झुकाव सिद्धांतों की तरफ ज्यादा रहा है क्यूंकि सिद्धांतों की गहराई ज्यादा होती है और मजबूती भी |
किसी भी धर्म का आधार सिद्धांत ही तो होते हैं -द्वैत एक सिद्धांत है और अद्वैत भी सिद्धांत है |इसी प्रकार समाजवाद भी सिद्धांत है और साम्यवाद भी |आज का सिद्धांत तो पूंजीवाद है चूंकि नयी लोकसभा के चुने हुए सांसदों में करोड़पतियों की संख्या 88 प्रतिशत है |अप्रत्यक्ष रूप से यह इस तथ्य का प्रतीक है कि जो अपने आपको गरीबों के पोषक कहते हैं ,उनके समर्थक और संरक्षक कहलाते हैं वे भी वास्तव में पूंजीवादी हैं अन्यथा करोड़पति बनना कौन सा सरल है |
ईमानदारी से क्या कोई करोड़पति बन सकता है ?मेरा ख्याल है -नहीं लेकिन उन्हें जनता ने चुना है इसलिए ईमानदार हों या बेईमान अब वो शेर की तरह दहाड़ सकते हैं |
समस्या यह भी है कि आज जो स्वयं चुनकर आ गए हैं ,वे भी किसी व्यक्तिविशेष के पिछलग्गू हैं क्यूंकि हमारी राजनीति का स्वरुप ही व्यक्तिवादी है |
जब आप किसी व्यक्तिविशेष के पीछे होते हैं तो आपका अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता है |
यूँ समझिये जब हम किसी व्यक्तिविशेष के प्रति समर्पित हो जाते हैं तो अपनी गर्दन किसी और के हाथ में दे देते हैं फिर भी यदि वह व्यक्ति हमें जीवित रहने देता है तो यह उसका उपकार है |
हमारा समर्पण यदि किसी राजनीतिज्ञ के प्रति है तो हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि वर्तमान दौर में राजनीति कोई सैद्धांतिक लड़ाई नहीं रह गयी है बल्कि एक गलाकाट प्रतियोगिता है स्वार्थसिद्धि की |
इस दौर में जब तक आप आका की जय-जयकार कर रहे हैं और आका को लगता है कि आप उसके किसी काम आ सकते हैं तो आप जीवित रहेंगे अन्यथा आपकी हत्या भी हो सकती है |आप इस शब्द की गहराई में जाएँ इस से पहले मुझे यह स्पष्टीकरण देना जरूरी लगता है कि किसी का चरित्र हनन होना भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए हत्या ही है |इस अवस्था में हो सकता है शारीरिक रूप में तो व्यक्ति जीवित हों लेकिन राजनीतिक रूप से ख़त्म हो जाएँ |बदनाम के बारे में पुरानी कहावत है-बद अच्छा,बदनाम बुरा |
गांधीवाद ,नेहरूवाद,मार्क्सवाद ,लेनिनवाद आदि हर वाद ,व्यक्तिविशेष से ज्यादा सिद्धांतों का ही तो नाम है |गाँधी,नेहरू,मार्क्स और लेनिन भी व्यक्ति ही थे लेकिन ये लोग अपने-अपने देशों के भक्त थे |विवाद तो सबके साथ रहे होंगे लेकिन ये उस तरह के अपराधी नहीं थे जिस प्रकार के अपराधी हमारे 43 प्रतिशत नवनिर्वाचित सांसद हैं |
आकार में विकार होते ही हैं यह एक सच्चाई है |जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं वे ऐसे लोग होते हैं जो अपने गुणों को इतना चमकाते हैं कि उस चमक में उनके कतिपय दोष नज़रों से ओझल हो जाते हैं |इस प्रकार वे हमारे आदर्श बन जाते हैं |
हमारे जितने भी महापुरुष हैं ज्यादातर इसी श्रेणी में आते हैं |ऐसे लोगों के कुछ सिद्धांत थे इसलिए उनके प्रति समर्पण में कुछ हानि भी नहीं थी |वे संरक्षण देते थे किसी प्रकार की जानलेवा अथवा बहुत घातक हानि नहीं कर सकते थे |
आज की यह एक दुखद स्थिति है कि राजनीति में जो लोग सक्रिय हैं उनका कोई सिद्धांतवादी आदर्श नहीं है इसलिए उनकी आस्था संविधान के प्रति भी बहुत गहरी नहीं है |वे उन लोगों की बौद्धिक क्षमता के सामने कहीं नहीं ठहरते,जिन्होंने संविधान बनाया था |
वे किसी न किसी धर्म से तो जरूर सम्बंधित रहे होंगे लेकिन उनकी धार्मिक मान्यताओं की गहराई कर्मकांड अथवा सामाजिक औपचारिकता से आगे नहीं जातीं |
वे अपने आपको धार्मिक तो प्रदर्शित करेंगे लेकिन उसका लक्ष्य अपने मतदाताओं को प्रभावित करने से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता |उन्हें डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की श्रेणी का धार्मिक हम नहीं मान सकते |डॉ.राधाकृष्णन धर्म का लक्ष्य बताते थे-अंतिम सत्य का अनुभव |ऐसे दार्शनिक महानुभाव जब भारत के राष्ट्रपति थे तब भारत विश्वगुरु की पुरानी पहचान रखता था लेकिन व्यक्तिवादी सांसदों से ऐसी सोच की अपेक्षा नहीं की जा सकती |
भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर की शुरूआत स्वतंत्रता के महान संघर्ष से शुरू हुई थी |उस संघर्ष में जिसका प्रभाव सबसे ज्यादा दिखा ,वो नाम था-महात्मा गाँधी का |महात्मा गाँधी का आदर्श था-जिओ और जीने दो |अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत उन्हें धार्मिक व्यक्ति सिद्ध करते हैं लेकिन वे न हिन्दू महासभाई थे और न ही मुस्लिम लीगी |
वे हिंदुस्तान में नहीं बल्कि भारतवर्ष में यकीन रखते थे ,ऐसा लगता है |क्यूंकि न हिन्दू महासभा वाले उन्हें पसंद करते थे और न संघ वाले | महात्मा गाँधी ऐसे भारत के हिमायती थे जहाँ किसी भी धार्मिक मान्यताओं वाला इंसान सहज व् शांतिपूर्ण जीवन जी सके |
संघी ,हिन्दू महासभाई और मुस्लिम लेगी बेशक महात्मा गाँधी से सहमत नहीं थे लेकिन वे सिद्धांतविहीन भी नहीं थे उन सबका अपना स्तर था |वे चाहे जो हों लेकिन मुझे लगता है वे अपराधी नहीं थे |
हमारी वर्तमान लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्यों में से 43 प्रतिशत लोग गंभीर अपराधों में लिप्त रहे हैं लेकिन जनता ने उन्हें चुना है |ये लोग देश को किस ओर लेकर जाएंगे यह सोचने की बात है |
सोचने की बात यह भी है कि जो अपराधी मानसिकता के हैं उनका सिद्धांतों से कितना और कैसा सम्बन्ध होगा ,इसे आसानी से समझा जा सकता है |
सिद्धांतों में जब दिलचस्पी नहीं है तो जिंदाबाद के नारे लगाने के सिवा और क्या विकल्प बचता है ?
जिन्होंने अपना उल्लू सीधा करना है,वो किसी की भी जिंदाबाद कर सकते हैं |ऐसे लोग हमारे भाग्य विधाता बन गए हैं कि वो अपनी संपत्ति में अभिवृद्धि करने और अपनी गैरकानूनी हुकूमत चलाने के कामो के अलावा राष्ट्रहित का कुछ उल्लेखनीय काम करेंगे ,इसमें मुझे संदेह है |
बड़ी कठिनाई यह हुई है कि सत्रहवीं लोकसभा में विपक्ष मजबूत नहीं है |हालत ऐसे हैं कि लगता है विपक्ष जैसे है ही नहीं |
ऐसे हालातों में सरकार निरंकुश हो सकती है |सरकार का मतलब है प्रधानमंत्री ,जिन्होंने अजेय जैसी स्थिति प्राप्त करने की अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है |
इस स्थिति में यदि प्रधानमंत्री तानाशाह बन जाएँ तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा |
प्रजातंत्र के भूत और भविष्य के मद्देनज़र सोचें तो आज की भारत सरकार भाजपा की सरकार है |भाजपा या एन डी ए सरकार कहने में किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि सब इसे मोदी सरकार कहते हैं |यह व्यक्तिवाद की चरम सीमा है संविधान की प्रजातांत्रिक अवधारणा के विरूद्ध है |
संवैधानिक व्यवस्था की दृष्टि से यह एक खतरनाक स्थिति है |अटल जी के शासन में पार्टी या दल किसी नेता विशेष की जेब में नहीं था |लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है |इस दृष्टि से जनता को जाग्रत होना चाहिए क्योंकि नरेंद्र मोदी जी को चुनौती देने वाला कोई नहीं है |
सत्यनिष्ठ नेतृत्व के अभाव में जनता कब तक और कितनी जागेगी यह तो समय ही बताएगा | यह बात जरूर है कि हम आस्तिक लोग हैं और परमात्मा में यकीन रखते हैं |हमारी परमात्मा से प्रार्थना है कि प्रभु नरेंद्र मोदी जी का विवेक जाग्रत रखें ताकि वे जनता की अपेक्षाओं को पूरा कर सकें क्यूंकि स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि अन्धविश्वास भी कल्याण कर सकता है बशर्ते वह व्यक्ति अन्धा न हो जिस पर अन्धविश्वास किया जा रहा है | इस दृष्टि से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का सत्यनिष्ठ और विवेकी बने रहना सर्वाधिक आवश्यक है |
व्यक्तिवाद की आंधी में बेबस सिद्धांत और भारत
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