सर्पपाश से मुक्त होने की क्षमता भी राम ही देता है

रामकुमार 'सेवक' 

गरुड़ के मन में भ्रम आ गया कि ये कैसे भगवान के अवतार हैं जिन्हें मुक्त करने के लिए मेरी सेवाओं की ज़रुरत पडी है |अगर ये नारायण भगवान विष्णु के अवतार रहे होते तो उन्हें गरुड़ की सेवाओं की आवश्यकता न पड़ती |

गरुड़ अभी यह सब सोच ही रहा था कि रोम-रोम में बसने वाले राम का ध्यान आ गया |साहिर लुधियानवी साहब ने अपनी एक रचना में लिखा था-

हे रोम रोम में बसने वाले राम ,जगत के स्वामी ,हे अंतर्यामी ,मैं तुझसे क्या माँगूँ 

राम,अल्लाह अथवा खुदा में सिर्फ शब्दों का ही फर्क है अन्यथा इस परम अस्तित्व के एहसास में जरा भी फर्क नहीं |इसकी अनुपस्थिति कभी नहीं होती |इसे सिर्फ हम भूल सकते हैं इसीलए महात्मा कहते हैं-

साँस साँस सिमरो गोविन्द 

सिर्फ ध्यान में कमी होती है अन्यथा परमात्मा के बारे में तो कहते हैं कि - आप मुक्त, मुक्त, मुक्त करे संसार |

इन्द्र सिंह जी अनथक (अब ब्रह्मलीन), ने अपने एक गीत में लिखा है-

गुरु पूरा ,ज्ञान पूरा ,निरंकार वी पूरा ए

पूरी तेरी साध संगत दरबार वी पूरा ए

इस प्रकार - 

पूरे का किया सब कुछ पूरा ,वाद घाट कुछ नाही 

कहते हैं-  .

इस पर ब्रह्म निरंकार का किया सब कुछ पूरा है तो किसी प्रकार की कमी नहीं हो सकती |

अहंकार ख़त्म हुआ तो निरंकार का एहसास हो गया | निरंकार अवकाश पर तो कहीं गया हुआ था नहीं |इसे तो कभी कभी हम भूल जाते हैं ||यह मालिक ध्यान में आया तो हर फासला मिट गया |

हो सकता है इस मालिक ने मुझ दास की सेवा ली हो |गरुड़ जी को यह एहसास हुआ तो सर्वयापी प्रभु के प्रति विश्वास प्रबल हो गया क्यूंकि जब अहंकार हावी  था तो निरंकार प्रभु का जरा भी एहसास न था |

गुरु शिष्य को कृपा पूर्वक पूर्णत्व प्रदान कर देता है |शिवजी ने लीला रची और गरुड़ जी को सत्संग से जोड़ा |

उन्होंने ही बताया कि कैलाश पर्वत पर काकभुशुण्डि जी कथा कर रहे है |उन्होंने ही गरुड़ जी को सत्संग की महत्ता समझाई |

सत्संग के अभाव में  गरुड़ जी के मन में जो कर्तापन का अहंकार उत्पन्न हो गया था ,उसका अन्त हुआ और सर्वव्यापी निरंकार की ओर ध्यान वापस आ गया |

जैसे ही ध्यान आया, अहंकार की काई निरंकार के एहसास में परिवर्तित हो गयी और भक्ति मार्ग प्रशस्त हो गया |इसीलिए महात्माओं ने स्वांस सुमिरन करने की बात कही है |

पावन वाणी में महात्मा कहते हैं -

स्वांस स्वांस सिमरो गोबिंद .मन अंतर की उतरे चिंत |     

निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे - सन्तों के लक्षण - सेवा, सुमिरन, सत्संग | 

निरंकार का एहसास हुआ तो भेद समाप्त हो गया | याद आ गया -

तेरा रूप है यह संसार, सबका भला करो करतार, मेरी मांग यही दातार, इक  तू ही निरंकार |