- रामकुमार 'सेवक'
अक्सर मेरे जैसे लोगों की यह कमजोरी होती है कि अगर कोई थोड़ी सी भी प्रशंसा कर दे तो आपै से बाहर हो जाते हैं,और थोड़ी सी भी आलोचना अगर कोई कर दे तो क्रोधित हो जाते हैं |यह क्रोध कभी कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देता है कि झगडे -फसाद की नौबत आ जाती है इसलिए सन्तों ने सहज रहने की बात कही है |
कठिनाई तो तब होती है जब हम हम प्रशंसा को खुद से जोड़ लेते हैं |यह स्थिति किसी परीक्षा से कम नहीं होती |जब शुरूआत में हम प्रवचन का अभ्यास शुरू करते हैं तो एक अजीब सा दुराग्रह पैदा हो जाता है |हम कोशिश करते हैं कि सत्संग में मेरी बारी जरूर आये |मुझे हर संगत में बोलने का मौका मिले |यह दुराग्रह हमें भक्ति के उच्च पद से गिरावट की और धकेल देता है |यह स्थिति बहुत दर्दनाक होती है | सुनाने का यह भाव कई बार इतना प्रबल हो जाता है कि गुरु और निरंकार की दृष्टि में हम गिर जाते हैं |
मुझे आदरणीय महात्मा निर्मल जोशी जी द्वारा सुनाया गया एक प्रसंग ध्यान आ रहा है कि प्रायः कोई भी व्यक्ति अपनी प्रशंसा सुननी बहुत पसंद करता है |लेकिन अध्यात्म में व्यक्तिगत प्रशंसा का कोई महत्त्व नहीं है |
निर्मल जोशी जी ने एक बार युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी से यह पूछा कि-
हम बोलने से पहले धर्मग्रथों के उद्धरणों को याद रखने की कोशिश करते हैं |इस प्रकार लोगों को अपने तर्कों से प्रभावित करने की कोशिश करते हैं इसके बावजूद लोग हमसे प्रभावित नहीं होते जबकि आप साधारण बातें कहते हैं इसके बावजूद संगतों पर आपकी बातों का बहुत सुन्दर प्रभाव दीखता है जबकि हमारे तर्कों का कोई प्रभाव नज़र नहीं आता ,इसका क्या कारण है ?
बाबा जी ने सहज शब्दों में कहा कि शुरू से ही मैं हर वक़्ता को सुनने की कोशिश करता हूँ |इस प्रकार मेरा सुनने का बीज पड़ जाता है जबकि आप लोग अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं |मैं सबको सुनता हूँ तो महात्मा भी मुझे सुनते हैं |आप सुनने का बीज डालते नहीं तो महात्मा आपकी विद्वता पूर्ण बात को भी ध्यान से नहीं सुनते |
इस सम्बन्ध में मुझे बहन राज वासदेव सिंह जी की बात भी याद आती है |उनके मुख से यह बात मैंने अनेकों बार सुनी है कि सत्संग में हम किसी को सिखाने के भाव से नहीं जाते बल्कि कृतज्ञ भाव से जाते हैं कि अगर मुझे कुछ कहने का मौका मिल रहा है तो यह मालिक की कृपा है |इस भाव से जब हम बोलते हैं तो हर प्रकार के अभिमान से बचे रहते हैं |
यदि मालिक ने हमें बोलने की कला दी है तो इसके लिए प्रभु का धन्यवाद करना चाहिए न कि अभिमान में घिरकर खुद की भक्ति को ख़त्म किया जाए |
कुछ ही समय पहले मैं बाबा हरदेव सिंह जी का मुक्ति पर्व के अवसर पर किया गया एक प्रवचन सुन रहा था |बाबा हरदेव सिंह जी ने सेवादल रैली के मार्चिंग का जिक्र करते हुए -
न हिन्दू न सिख ईसाई ,न हम मुसलमान हैं ,मानवता है धर्म हमारा हम केवल इंसान हैं |बाबा जी ने कहा कि -कुछ भी बनो मुबारक है पर पहले बस इंसान बनो |
उन्होने सम्पूर्ण अवतार बाणी के शब्द को भी अभिव्यक्ति का जरिया बनाया -हिन्दू -मुस्लिम -सिख ,ईसाई एक प्रभु की हैं संतान ,मानव समझ कर प्यार है करना हमने सबसे एक सामान |इस प्रकार बाबा जी ने मानव मात्र को विश्व एकता का सन्देश दिया |