कविता - अद्भुत मानव






एक दिन राह में पैदल चलते हुए ,

मै रास्ता भटक गया,

अपनी पुरानी आदत के अनुसार,

फिर एक सवाल पर अटक यया,

मै खुद इन्सान हूँ,

इसलिये मुझे इन्सानी जाति है भाती ,

परन्तु सच बताऊँ, तो इसकीं फितरत.

गेरी समझ में बिलकुल नहीं आती,

आज तलक कभी नहीं सुना कि,

कोई बैल को कहता हो- कि तू बैल बन जा,

या कोई चील को कहता हो- कि तू चील बच जा,

मैने जब भी सुना, तो मेरा सर चकराया है,

कभी  किसी ने पशु को, पशु बनना नहीं सिखाया है,

परन्तु हमारे सन्त , पीर- फ़कीर  

इन्सानों को हीं क्‍यों जयाते हैं?

इन्सान तू इन्सान बन जा,

हर वार ये क्‍यों  बताते हैं,

इसका मतलब हर पशु -पक्षी ,

ईश्वर द्वारा निर्धारित ,

अपने दायित्वों को निभा रहा है,

और बड़ी कुशलता से,

धरती पर अपना जींवन बिता रहा है,

पर इन्सान वो- कुछ और हीं किये जा रहा है,

अब वो इन्सान आउट ऑफ़ द वे  जिये जा रहा है,

आज के इन्सान नें लालव, अभिमान  का साथ कर दिया है,

जो उसके मुताबिक न चले उससे दो-दो हाथ कर लिया है ,

अगर किसी के ऐब  देखने हों,

तो इन्सान चील कीं नज़र रखता है,

जगली शेर कीं तरह,

अपने शिकार की पूरी खबर रखता है,

मतलब पड़ने पर यह ,

श्वान  की वरह दुम हिलाता है,

और काम हो जाने पर,

गिरगिट  सा स्तर दिखाता है,

किसी के सिलाफ बोलना हो तो,

ये सॉँप सा विष उगलता है,

ओर अपने से कमजोर पर,

चीते सा उछलता  है,

इसका मतलब इन्सान ने ,

इन्सानीं चोले पर थी आवरण किये हैं,

जंगली ,  पालतु सभी जानवरों के,

युण ग्रहण (किये है,

छूने को तो इन्सान ने,

चॉँद और मंगल को भी छुआ है ,

अफसोस / जो होना चाहिये था,

वो हीं नहीं हुआ है,

खुद को साबित करनें में हीं,

इसकी बीत जाती हैं दिन ऑर रातें,

सच कहूँ तो अब इन्सान में,

इन्सान वाले गुण , नजर हीं नहीं आते,

निंदा - चुगली के वक़्त , इन्सान खीजता हीं नहीं,

किसी को दुख में देख, इसका ह्रदय पसीजता हीं नहीं,

किसी के नुकसान की इसे, कहाँ परवाह है,

ये अपनी इच्छाओं को पूरा करने में हीं तबाह है,

किसी को भीं अब इन्सान, कोई आशा  नहीं देता,

दिल तोड़ देता है पर, दिलासा नहीं देता ,

आखिर कब तक हम,

लालंसाओं के दरियाओं में अविरल  बहेंगे ,

अपने निजधाम पहुँच के, ईश्वर से क्या कहेगें ?

अपने कारनायों का चिटठा , हम कैसे ईश्वर को दिखाएंगे ,

हीरा जन्म बर्बाद  कर लिया, क्या / ये बताएगे,

उस वक़्त परमात्मा का दिल भी , बेहद दुखेगा,

जब उसको यानवता के अनुरूप , तेरा जीवन नहीं दिखेगा,

जब तक हम, मानवीय युणों से,

नर वन का नर तन का श्रृंगार नहीं करेगें;

तब तक परमात्मा भी हमें ,

चोरी लाख के चक्कर: से, पार नहीं करेगे,

मुक्ति के लिंये हमें,

जानवरों की, प्रवृति से ऊपर उठना पड़ेगा ,

और ब्रह्मज्ञान की खातिर,

युरु चरणों में झुकना पड़ेगा ,

तभी  हमारे जीवन में...

प्रेम , दया, मिलवर्तन का विकास होगा ,

और भक्ति के पथ पर,

अलौकिक -दिव्य  प्रकाश होगा ,

तब जाके बरसों से भटकती  हमारी रुह को,

'जतन' आराम मिलेगा ,

मे कौन हूँ ? किसलिये आया हूँ ?

जैसे प्रश्नो को विराम मिलेगा ,

गर मानव एकत्व से रहे ,

तो धरा पर रोज पर्व होगा ,

और अपनी श्रेष्ठ रचना के श्रेष्ठ

कर्म देखकर,

ईश्वर को भी गर्व होगा |

कवि :

अश्वनी कुमार  'जतन'

(इलाहाबाद)

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