महात्मा दादूजी का एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है |वास्तव में दादू जी बहुत विनम्र महात्मा थे |अक्सर वे अपनी कुटिया के बाहर निकलकर गाँव में झाडू लगा देते थे | एक सैनिक को ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा थी |उस समय यह रहमत महात्मा दादू जी के माध्यम से बरस रही थी इसलिए वह उस गाँव में आया जहाँ दादू जी की कुटिया थी | सैनिक के पूछने पर ,शिष्यों ने बताया कि महात्मा गाँव में कहीं झाडू लगा रहे होंगे | सैनिक को ध्यान आया कि थोड़ी देर पहले जिस बुजुर्ग पर मैंने अपनी खीझ मिटाने के लिए कोड़े मारे हैं,कहीं वही तो दादू जी नहीं हैं ,यह सोचकर उसमें पश्चाताप का भाव भी उत्पन्न हो गया | वह डरता-डरता दादूजी के पास गया और क्षमा याचना की | महात्मा ने कहा कि लोग यदि बर्तन भी खरीदते हैं तो उसे टंका -टंका कर देखते हैं,तुम तो ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने आये हो तो तुमने गुरु की परीक्षा लेकर परख लिया कि गुरु कहीं क्रोध के विकार से युक्त तो नहीं है | बाबा अवतार सिंह जी यथार्थवादी तो थे ही लेकिन क्षमाशील भी थे ,वे भक्तों को आचरण सँभालने की बात कहा करते थे , सम्पूर्ण अवतार बाणी के भाब्द न.६३ में वे कहते हैं कि- सतगुरु तक के अन डि ठ करदा मत्थे पाउँदा वट नहीं इस प्रकार सतगुरु क्षमाशील होता है |यथार्थवादी हममें से कई शिष्य ताक़त मिलने पर अहंकार में चूर हैकर आचरण से पतित हो जाते हैं इसलिए बाबा हरदेव सिंह जी ने भी अहंकार से दूर रहकर मर्यादित आचरण करने का सन्देश दिया |हमें मर्यादित आचरण को जीवन का अंग बनाना होगा | इसके बावजूद सत्य के प्रति जाग्रत रहना होगा | ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ तू ही निरंकार रामकुमार सेवक vibrations निराकार हैं |एक घंटा पहले मैं सत्संग में था |वहां की vibrations मुझे वहीं बैठे रहने को प्रेरित कर रही थीं | वह क्या था जो मुझे वहां ज्यादा देर तक बैठने लो प्रेरित कर रहा था |इस पर विचार करने पर पाता हूँ कि इस प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर है -वातावरण वातावरण व्यक्ति विशेष के शब्दों,उसके व्यवहार,उसके विचार,उसकी क्रिया आदि से निर्मित होता है | निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी एक उदाहरण दिया करते थे कि एक आदमी कमरे में प्रवेश करता हैं और उस कमरे में मौजूद हर आदमी खुश हो जाता है और उससे कह उठता है कि आप भीतर आये तो ऐसा लगा जैसे कमरे में बहार आ गयी | इस आदमी के स्वभाव के विपरीत आदमी जो थोड़ी देर पहले उसी कमरे में था तो लोग सोच रहे थे कि-न जाने कब कमरे से बाहर निकलेगा |यह जाएगा तो वातावरण हल्का होगा ,कमरे में सहजता आएगी | आमतौर से वह व्यक्ति जो लमऱे में आया था वह कोई विस्फोटक लेकर नहीं आया रहा और जिसे देखकर कहा गया -आप आये बहार आयी तो वह कमरे में गुलाब के फूल लेकर तो नहीं आया था |दोनों लोग कमरे में खाली हाथ के साथ ही प्रविष्ट हुए लेकिन दोनों का प्रभाव एक दूसरे से विपरीत ही तो रहा | कमरे में निराकार तत्व पहले भी था और अब भी है | निराकार किसी को दिखाई तो नहीं दे रहा लेकिन निराकार का प्रभाव जरूर दिखाई दे रहा है | निदा फाजली साहब लिखते हैं- खुदा मुझको ऐसी खुदाई न दे कि अपने सिवा,कुछ दिखाई न दे खुदा ऐसे एहसास का बाम है,रहे सामने पर दिखाई न दे रामकुमार सेवक