बाबा जी की दृष्टि में उस भक्ति भाव की बहुत कीमत थी


रामकुमार सेवक 


बाबा हरदेव सिंह जी के बारे में आज सुबह एक ऐसा प्रसंग सुनने को मिला जो मन-बुद्धि पर जैसे अंकित हो गया |

निरंकारी मिशन के चौथे परमसतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी ने दिल्ली की विभिन्न कॉलोनियों में सत्संग समारोह आयोजित करने की एक श्रृंखला आयोजित की थी |

उन दिनों यह श्रृंखला साप्ताहिक कार्यक्रमों के रूप में आयोजित की जाती थी |

महात्मा ने बताया कि-

हर कॉलोनी में सत्संग आयोजित करने के पीछे मूल भाव यही होता था कि लोगों के बीच संगतों में भाग लेने की उत्कंठा बढे |

यह कुछ ऐसा था कि कुंआ जैसे खुद प्यासे के पास जा रहा हो लेकिन मनुष्य की यह सहज वृत्ति है कि जैसे -जैसे सुविधा बढ़ती है इंसान की आराम तलबी भी बढ़ती जाती है |

बाबा जी जिन कॉलोनियों में जाते थे वहां के निवासी बाबा जी के चरण अपने घरों में डलवाने की इच्छा रखते थे |

यद्यपि प्रबंध तंत्र इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की कोशिश करता था क्यूंकि निजी चाहत की इस आदत के कारण बाबा जी को व्यक्तिगत रूप से बहुत असुविधा होती थी साथ ही कार्यक्रमों के आयोजन में भी ज्यादा समय लगता था लेकिन बाबा जी संगतों को बहुत प्यार करते थे और अगर कोई मिशन से सम्बद्ध नहीं भी होता बाबा जी उसे भी पूरा स्नेह देते थे और अपनी असुविधा को  नज़रअंदाज़ करके ऐसे लोगों को भी मिशन का प्रेम सन्देश अपने सहज व्यवहार से देते थे |

ऐसे ही एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए महात्मा ने कहा कि बरसात के दिन थे |उस कोलोनी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी |कॉलोनी के एक हिस्से में अंधकार और कीचड का भी साम्राज्य था |

हर कॉलोनी के निवासियों की तरह यहाँ के सज्जनो ने भी बाबा जी से अपने घरों में चरण डालने की प्रार्थना की |

बरसात और अंधकार होने के कारण समय बढ़ता गया |आधी रात का समय बीत चुका था |

बाबा जी को अब अपने निवास स्थान ,निरंकारी कॉलोनी की ऒर प्रस्थान करना था लेकिन कुछ सज्जन अब भी चाहते थे कि बाबा जी अपने चरण डालकर उनके घरों को भी पवित्र कर दें लेकिन यह किसी भी तरह सुविधाजनक नहीं था |  

बाबा जी ने देखा कि ऐसे अभिलाशियों की संख्या अब बहुत ज्यादा नहीं है इसलिए अपने सहायक को संकेत किया कि इन सज्जनो से भी इनका भाव पूछ लो |

अंत में एक माँ के साथ उसकी बेटी का निवेदन बचा |

वह एक जनता क्वार्टर था |एक कमरे का फ्लैट शायद |

गली में कीचड था और अँधेरा भी था |गली में अँधेरा होने के कारण लोगों ने बीच में ईंटें रख रखी थी लेकिन बाबा जी भक्तों की प्रार्थना को सर्वाधिक महत्व देते थे |

उसी स्थिति में बाबा जी,  उस फ्लैट तक पहुंचे |

यह फ्लैट चौथी मंजिल पर था |माँ -बेटी बाबा जी को हो रही असुविधा को गहराई से महसूस कर रही थी |वजह बेशक यह एक जनता फ्लैट था लेकिन उनके लिए जैसे वह एक महल था |

बेटी कहने लगी-बाबा जी,इतनी उम्मीद नहीं थी कि इस गली में जहाँ अँधेरा और कीचड है आप इतनी कृपा करेंगे |अगर मुझे आपको हो रही असुविधा का एहसास रहा होता तो शायद यह विनती करती ही नहीं |

बाबा जी सहज भाव से मुस्कुराते रहे |

बाबा जी की दृष्टि बहुत सूक्ष्म थी उन्होंने कहा -आप जो हर इतवार को निरंकारी कॉलोनी संगत में पहुँचती हो,तो इस गली में जो कीचड और अँधेरा है उसे देखना जरूरी था |

स्पष्ट हो गया कि ये दोनों माँ-बेटी निरंकारी कॉलोनी सत्संग में पहुंचकर जो अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती थीं,बाबा जी की दृष्टि में उस भक्ति भाव की बहुत कीमत थी |

धन निरंकार जी 

Popular posts
नयी कविता के प्रणेता व प्रयोगधर्मी कवि - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
चित्र
सितम्बर 2025 - प्रगतिशील साहित्य
चित्र
महात्मा दादूजी का एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है |वास्तव में दादू जी बहुत विनम्र महात्मा थे |अक्सर वे अपनी कुटिया के बाहर निकलकर गाँव में झाडू लगा देते थे | एक सैनिक को ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा थी |उस समय यह रहमत महात्मा दादू जी के माध्यम से बरस रही थी इसलिए वह उस गाँव में आया जहाँ दादू जी की कुटिया थी | सैनिक के पूछने पर ,शिष्यों ने बताया कि महात्मा गाँव में कहीं झाडू लगा रहे होंगे | सैनिक को ध्यान आया कि थोड़ी देर पहले जिस बुजुर्ग पर मैंने अपनी खीझ मिटाने के लिए कोड़े मारे हैं,कहीं वही तो दादू जी नहीं हैं ,यह सोचकर उसमें पश्चाताप का भाव भी उत्पन्न हो गया | वह डरता-डरता दादूजी के पास गया और क्षमा याचना की | महात्मा ने कहा कि लोग यदि बर्तन भी खरीदते हैं तो उसे टंका -टंका कर देखते हैं,तुम तो ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने आये हो तो तुमने गुरु की परीक्षा लेकर परख लिया कि गुरु कहीं क्रोध के विकार से युक्त तो नहीं है | बाबा अवतार सिंह जी यथार्थवादी तो थे ही लेकिन क्षमाशील भी थे ,वे भक्तों को आचरण सँभालने की बात कहा करते थे , सम्पूर्ण अवतार बाणी के भाब्द न.६३ में वे कहते हैं कि- सतगुरु तक के अन डि ठ करदा मत्थे पाउँदा वट नहीं इस प्रकार सतगुरु क्षमाशील होता है |यथार्थवादी हममें से कई शिष्य ताक़त मिलने पर अहंकार में चूर हैकर आचरण से पतित हो जाते हैं इसलिए बाबा हरदेव सिंह जी ने भी अहंकार से दूर रहकर मर्यादित आचरण करने का सन्देश दिया |हमें मर्यादित आचरण को जीवन का अंग बनाना होगा | इसके बावजूद सत्य के प्रति जाग्रत रहना होगा | ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ तू ही निरंकार रामकुमार सेवक vibrations निराकार हैं |एक घंटा पहले मैं सत्संग में था |वहां की vibrations मुझे वहीं बैठे रहने को प्रेरित कर रही थीं | वह क्या था जो मुझे वहां ज्यादा देर तक बैठने लो प्रेरित कर रहा था |इस पर विचार करने पर पाता हूँ कि इस प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर है -वातावरण वातावरण व्यक्ति विशेष के शब्दों,उसके व्यवहार,उसके विचार,उसकी क्रिया आदि से निर्मित होता है | निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी एक उदाहरण दिया करते थे कि एक आदमी कमरे में प्रवेश करता हैं और उस कमरे में मौजूद हर आदमी खुश हो जाता है और उससे कह उठता है कि आप भीतर आये तो ऐसा लगा जैसे कमरे में बहार आ गयी | इस आदमी के स्वभाव के विपरीत आदमी जो थोड़ी देर पहले उसी कमरे में था तो लोग सोच रहे थे कि-न जाने कब कमरे से बाहर निकलेगा |यह जाएगा तो वातावरण हल्का होगा ,कमरे में सहजता आएगी | आमतौर से वह व्यक्ति जो लमऱे में आया था वह कोई विस्फोटक लेकर नहीं आया रहा और जिसे देखकर कहा गया -आप आये बहार आयी तो वह कमरे में गुलाब के फूल लेकर तो नहीं आया था |दोनों लोग कमरे में खाली हाथ के साथ ही प्रविष्ट हुए लेकिन दोनों का प्रभाव एक दूसरे से विपरीत ही तो रहा | कमरे में निराकार तत्व पहले भी था और अब भी है | निराकार किसी को दिखाई तो नहीं दे रहा लेकिन निराकार का प्रभाव जरूर दिखाई दे रहा है | निदा फाजली साहब लिखते हैं- खुदा मुझको ऐसी खुदाई न दे कि अपने सिवा,कुछ दिखाई न दे खुदा ऐसे एहसास का बाम है,रहे सामने पर दिखाई न दे रामकुमार सेवक
चित्र
गुरु-शिष्य संबंधों का आधार -कुछ लौकिक कुछ अलौकिक
चित्र
जुलाई 2025 - प्रगतिशील साहित्य
चित्र